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विशेष : वक्त के साथ बदल रही बस्तर की तस्वीर, गारमेंट फैक्ट्री में बुने जा रहे सपने, रोजगार की ओर बढ़ रहीं महिलाएं, पढ़ाई के साथ काम भी और जेब खर्च भी निकाल रही बेटियां

नक्सल क्षेत्र के रूप में जाने जाने वाले बस्तर की तस्वीर अब बदल रही है. इस बदलते बस्तर में अब विकास के साथ-साथ, रोजगारोन्मुखी कार्य किए जा रहे हैं. संभाग के बीजापुर में भी दंतेवाड़ा और कोंडागांव की तरह गारमेंट्स फैक्ट्री (Garments Factory) शुरू हो गई है. फैक्ट्री के लिए नया भवन बनकर तैयार है और जल्द ही यहां इसकी शिफ्टिंग होगी. गारमेंट फैक्ट्री फिलहाल बीजापुर के एजुकेशन बिल्डिंग में संचालित है, जहां स्थानीय महिलाओं को काम मिलने से उनकी तकलीफें दूर होने लगी हैं.

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बीजापुर गारमेंट फैक्ट्री (Garments Factory) में काम करने वाली सविता लड़कर ने बताया कि वह दिसंबर से यहां काम कर रही हैं. मोरमेड़ गांव की रहने वाली सविता ने कहा कि पति की मौत के बाद वह बड़े ससुर के साथ रह रही हैं. वह पिछले चार महीने से कपड़ों के काम की ट्रेनिंग ले रही हैं. सविता कहती है “मेरे दो बच्चे हैं, जिन्हें बिना पिता के पालना बहुत कठिन है. मुझे यहां काम मिलने से घर का गुजारा होने लगा है. आने वाले समय में मैं बेहतर ढंग से काम करूंगी ताकि ज्यादा पैसे कमा सकूं.” यह अवसर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के प्रयासों के कारण मिला, जिन्होंने बीजापुर में भी गारमेंट फैक्ट्री शुरू किए जाने पर जोर दिया था. आने वाले समय में इस फैक्ट्री में करीब 600 लोगों को रोजगार से जोड़ने की तैयारी है.

गारमेंट फैक्ट्री (Garments Factory) में दक्षिण भारत की एक कंपनी के साथ बनियान बनाने का अनुबंध हुआ है. वहीं से फिलहाल कच्चे माल की सप्लाई हो रही है और प्रशिक्षण के तौर पर महिलाओं और युवतियों को कपड़ों की इस्त्री करना, सिलाई करना और इसकी पैकेजिंग करने का काम सिखाया जा रहा है. जैसे ही फैक्ट्री नए भवन में शिफ्ट होगी तब रोजगार का आंकड़ा दोगुना बढ़ाकर उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाएगी.

पढ़ाई के साथ-साथ काम भी और जेब खर्च भी

चेरपाल गांव की रहने वाली मीना पुजारी बीजापुर में महिला हॉस्टल में रहकर अपने कॉलेज की पढ़ाई कर रही है. गांव से वहां आने के बाद उसे जेब खर्च के लिए काम चाहिए था. अब उसे बीजापुर के इसी गारमेंट फैक्ट्री में काम मिल गया है. प्रशिक्षण के काम के बाद मीना को वेतन भी बढ़कर मिलेगा. फिलहाल पढ़ाई के साथ जेब खर्च की पूर्ति होने और कुछ सीखने की वजह से वह खुश है. नक्सल पीड़ित परिवार की मोनेश्वरी दुर्गम को भी यहां काम मिला है. इस काम से उसके घर-परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी है. मोनेश्वरी ने बताया कि उसे बच्चों की पढ़ाई और उनके खर्च पूरा करने में काफी तकलीफ होती थी, लेकिन अब स्थिति पहले से ठीक होने लगी है.

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